यादों वाली चर्चा का हल्का रूप। छोटी, अजीब और बहुत ख़ास बातें।
अजीब व्यवस्थाएँ जो शायद दरअसल ख़राबियाँ थीं। कोई आवाज़ जो आज भी आपको सुनाई देती है। फ़ोरम की वे आदतें जिनका कोई तुक नहीं था। वह एक तस्वीर जो स्कूल के कनेक्शन पर बहुत देर से खुलती थी। वे मज़ाक़ जो महीनों चले। किसी पन्ने का ठीक वही रंग जो उसके बाद किसी ने नहीं देखा।
अगर समझाना पड़े तभी किसी को समझ आए, तो उसकी जगह यहीं है।